Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
वासनावागुराकृष्टो मनोहरिणको नृणाम् ।
परां विवशतामेति संसारवनगुल्मके ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनारूपी जाल से खींचा गया मनुष्यों का मन रूपी हिरन
संसाररूपी वन की झाड़ी में अत्यन्त विवशता को प्राप्त होता है