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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

असत्स्वेव विमोहेषु रामैवंप्रायवृत्तिषु । घनेषु तुच्छतामेत्य चिराय परिमूर्च्छति ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्लोकस्थ "आदौ से यह सूचित होता है कि जब चित्‌ के प्राथमिक चेत्यपदपात अज्ञाननिमित्तक है तव तन्मूलक द्वैतदर्शन भी अज्ञान निमित्तक है, यह इसलिए सिद्ध हुआ। चिति के चेत्य पद में पड़ने से ही “पदार्थप्रथा“ नाम को प्राप्त होकर नाम-रूप की विचित्रतासे चिति कलुषता को प्राप्त हुई है । वह कलुषी भाव ही वासना का पहला अकुर है, यह भाव है । इस प्रकार की वस्तु स्थिति वाले पदार्थो के नाम-रूपवेचित्रयाभासभ्रमों के, जो कि है ही नहीं, क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होने पर वह चिति अपनी स्वाभाविक पूर्णता को भूलकर, असत्‌ मनोरूपता को प्राप्त होकर अनादिकाल से लेकर जन्म, मरण आदि भ्रमो से मोह में पडती हे । भाव यह कि चेतन का चेत्योन्मुख होना ही अनर्थो की जड है, इसलिए उसीका निरोध करना चाहिए