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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

जिते मनसि सर्वैव विजिता चेन्द्रियावलिः । शीर्यते च यथा तन्तौ दग्धे मौक्तिकमालिका ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे डोरे के जल जाने पर मोती की माला टूट जाती हे वैसे ही मन के जीत लेने पर सब इन्द्रियाँ वश में आ जाती हे