Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 22–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verses 22–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
प्रतिभासवशादेव स्वप्नाकुलितचेतसः ।
हरिश्चन्द्रस्य संपन्ना रात्रिर्द्वादशवार्षिकी ॥ २२ ॥
चित्तानुभाववशतो मुहूर्तत्वे गतं युगम् ।
इन्द्रद्युम्नस्य वैरिञ्च्यपुराभ्यन्तरवर्तिनः ॥ २३ ॥
मनोज्ञया मनोवृत्त्या सुखतां याति रौरवम् ।
प्रातःप्राप्तव्यराज्यस्य सुबद्धस्येव बन्धनम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिभास के कारण ही स्वप्न से व्याकुल चित्तवाले हरिश्चन्द्र की एक रात बारह वर्ष की हो
गई चित्त के प्रभाव से ही ब्रह्मलोक में गये हुए राजा इन्द्रद्युम्न का एक मुहुर्त एक युग में बीत
गया । यदि हरिस्मरण आदि रूप मनोहर चित्तवृत्ति का उदय हो, तो घोर रोरव नरक दुःख भी
सुखरूप में परिवर्तित हो जाता है जैसे कि प्रात: मुझे अवश्य राज्य प्राप्त होनेवाला है, इस
बात का जिसे प्रमाणो में निश्चय है ओर जिसके हाथ-पैर हथकडी ओर बेड़ी से भलीभाँति
बँधे हैं, उसका बन्धन दुःख के बदले सुख रूप में परिवर्तित हो जाता है