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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

नानापुरसरिच्छैलरूपतामेत्य देहिनाम् । तनोत्यन्तःस्थमेवेदं जाग्रत्स्वप्नमयं मनः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह मन विविध नगर, नदी, पर्वत रूपता को प्राप्त होकर देहियों के अन्दरस्थित होकर ही जाग्रत-स्वप्नमयजगत्‌ का विस्तार करता है