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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verses 53–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verses 53–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 53,54

संस्कृत श्लोक

सुरत्वाद्दैत्यतामेत्य नागत्वान्नगतामपि । प्रतिभासवशाच्चित्तमापन्नं लवणो यथा ॥ ५३ ॥ नरत्वादेति नारीत्वं पितृत्वात्पुत्रतां गतः । यथा क्षिप्रं प्रति नरः स्वसंकल्पात्तथा मनः ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भ्रान्ति वश लवण राजा चण्डालता को प्राप्त हुआ था वैसे ही चित्त भ्रमवश देवत्व से दैत्यता को प्राप्त होकर नागता से (गजता या सर्पता से) वृक्षता या पर्वतता को प्राप्त होता है । जैसे पितृत्व से पुत्रता को प्राप्त हुआ मनुष्य अपने संकल्प से नरता से नारीत्व को प्राप्त होता हे वैसे ही अपने संकल्प से मन शीघ्र प्रत्येक वस्तु के रूप को प्राप्त होता हे