Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
तैलं तिलस्य चाक्रान्त्या स्फुटतामेति शाश्वतीम् ।
चेतसो मननासंगाद्घनीभूते सुखासुखे ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तृत मनमें, जिसमें मनन
द्वारा मूढवासना अत्यन्त मोह को प्राप्त हुई हे, संकल्प से जन्मस्थान, सुख-दुःख रहते हैं। वे
देश और काल के कारण कभी प्रचुर हो जाते हैं अथवा कभी स्वल्प हो जाते हैं ॥५६.५७॥
जैसे कोल्हू आदि यन्त्र से तिलो के पेरने से तेल सदा के लिए स्पष्ट हो जाता है वैसे ही चित्तके
अन्दर घनीभूत सुख-दुःख मन की वृत्ति से स्फुटता को प्राप्त होते हैं