Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
देशकालाभिधानेन राम संकल्प एव हि ।
कथ्यते तद्वशाद्यस्माद्देशकालौ स्थितिं गतौ ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि देश, काल और कर्म की विचित्रता से ही युख-दुःख आदि की
विचित्रता प्रसिद्ध है, फिर मननरूप मन की वृत्ति से (संकल्प से) सुख की विचित्रता होती है,
यह कैसे कहते हैं, तो इस पर कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, संकल्प ही देश और काल के नाम से कहा जाता है, क्योकि संकल्प के
कारण ही देश और काल की स्थिति है । भाव यह कि देश और काल स्वल्प ही क्यों न हों यदि
मन से उनके प्राचुर्यं का संकल्प किया जाय, तो उनकी विपुलता का अनुभव होता है तथा
विषय कितना भी तुच्छ क्यों न हो मन उसे उत्तम समझे, तो उसमें अधिक अनुराग देखा जाता
है। इससे देश और काल की स्थिति संकल्प से ही है, यह जो कहा वह ठीक कहा है