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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 110, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 110, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 110 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अभयं भयमज्ञस्य चेतसो वासनावतः । दूरतो मुग्धपान्थस्य स्थाणुर्याति पिशाचताम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भ्रान्त पथिक को दूर से स्थाणु भी पिशाच प्रतीत होता है वैसे ही वासनाओं वाले अज्ञानी चित्त को अभय में (जहाँ भय नहीं है वहाँ भी) भय होता है