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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अस्य चित्तमहाव्याधेश्चिकित्साया महौषधम् । स्वायत्तं श्रृणु वक्ष्यामि साधु सुस्वादु निश्चितम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, मैं इस चित्त रूपी महाव्याधि की चिकित्सा की महौषधि को आपसे कहूँगा, जो स्वाधीन है, अवश्य पुरुषार्थ को सिद्ध करती है, बड़ी मीठी ओर अव्यर्थ है, सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ ढसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ ग्यारहवाँ सर्ग यत्न से अभिमत वस्तु के तथा अहन्ता - ममता के त्याग का और चित्त पर विजय पाने के उपाय का तथा चित्त की एकाग्रता का वर्णन ।