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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

स्वेनैव पौरुषेणाशु स्वसंवेदनरूपिणा । यत्नेन चित्तवेतालस्त्यक्त्वेष्टं वस्तु जीयते ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रिय बाह्य विषय का परित्याग कर एकमात्र आत्माकारवृत्तिधारारूपी अपने ही पौरुष प्रयत्न से चित्तरूपी वेताल पर शीघ्र विजय प्राप्त की जाती है