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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 25–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verses 25–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 25,26

संस्कृत श्लोक

पुमान्मृतोऽस्मि जातोऽस्मि जीवामीति कुदृष्टयः । चेतसो वृत्तयो भान्ति चपलस्यासदुत्थिताः ॥ २५ ॥ न कश्चनेह म्रियते जायते न च कश्चन । स्वयं वेत्ति मृतं स्वस्य लोकमन्यं स्वकं मनः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

समाधि, सुषुप्ति आदि मे जन्म, मरण आदि दुखों का अनुभव नहीं होता और व्यवहारकाल में मनोवृत्तिपूर्वक ही जन्म, मरण आदि दुखों का अनुभव होता है, अतः सिद्ध हुआ कि संसार मनोवृत्तिमात्र है, यह दशति है। मैं पुरुष हूँ, मैं मरा हूँ, मे उत्पन्न हुआ हूँ और मैं जीता हूँ इत्यादि कुदृष्टियाँ चपल चित्त की असत्‌ ही उदित हुई वृत्तियाँ प्रतीत होती हैं । यहाँ पर न कोई मरता है न उत्पन्न होता है । मन अपने मरण और अपने लोकगमन की स्वयं कल्पना करता हे