Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
वातेनाकल्पनेनैवं तथा तद्धूयते मनः ।
भवन्ति यत्र शस्त्राग्निपवनास्तत्र भीर्भवेत् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने अधीन, अकठिन (अनायाससाध्य), अति स्वच्छ,
असंकल्पन में (कल्पनाभाव में) कौन-सा भय है ? जहाँ पर शस्त्र, अग्नि, आँधी आदि होते
हैं, वहीं पर भय होता है