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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 111, Verses 37–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 111, verses 37–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 111 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

स्वायते मृदुनि स्वच्छे किमसंकल्पने भयम् । इदं श्रेय इद नेति सिद्धमाबालमक्षतम् ॥ ३७ ॥ बालं पुत्रमिवोदारे मनः श्रेयसि योजयेत् । अक्षयं चानवं चेतःसिंहं संसृतिबृंहणम् । घ्नन्ति ये ते जयन्तीह निर्वाणपददायिनः ॥ ३८ ॥ भीमाः संभ्रमदायिन्यः संकल्पकदनादिमाः । विपदः संप्रसूयन्ते मृगतृष्णा मराविव ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

यह कल्याणकारी है, यह नहीं हे, यह बात बालकों तक में प्रसिद्ध है, इसलिए जैसे कोई विज्ञ पुरुष बालक पुत्र को भले कार्य में लगाता है वैसे ही पण्डित को चाहिये मन को उत्तम कल्याण में लगाये