Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 112, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
पुनः पौरुषमाश्रित्य चित्तमाक्रम्य चेतसा ।
विशोकं पदमाश्रित्य निराशङ्कः स्थिरो भव ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर पुरुषप्रयत्न
का अवलम्बन कर, चित्त को चित्त से आक्रान्त कर, शोक रहित पद को पाकर निःशंक होकर
स्थिर होड्ये