Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 112, Verses 9–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 112, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 112 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
मनोविलयमात्रेण दुःखशान्तिरवाप्यते ।
मनोमननमात्रेण दुःखं परमवाप्यते ॥ ९ ॥
दुःखमुत्पादयत्युच्चेरुत्थितश्चित्तराक्षसः ।
सुखायानन्तभोगाय तं प्रयत्नेन पातय ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मन के केवल विनाशमात्र से दुःख की शान्ति प्राप्त होती
है ओर मन के संकल्पनमात्र से परम दुःख प्राप्त होता है । उठा हुआ चित्त रूपी राक्षस विपुल
दुःख को उत्पन्न करता है, इसलिए मोक्ष सुख के लिए उसको प्रयत्नपूर्वक गिराओ