Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एषा हि वासना नित्यमसत्यैव यदुत्थिता ।
द्विचन्द्रभ्रान्तिवत्तेन त्यक्तुं राघव युज्यते ॥ १ ॥
अविद्या विद्यमानेव नष्टप्रज्ञेषु विद्यते ।
नाम्नैवाङ्गीकृताभावात्सम्यक्प्रज्ञेषु सा कुतः ॥ २ ॥
मा भवाज्ञो भव प्राज्ञः सम्यग्राम विचारय ।
नास्त्येवेन्दुर्द्वितीयः खे भ्रान्त्या संलक्ष्यते मुधा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या विवेकविज्ञानहीन पुरुषों में परमार्थ सत्य के समान दृढ़तररूप से विद्यमान हे, किन्तु
जो लोग विवेकविज्ञान से सम्पन्न हैं, उनमें तो अपरमार्थ होने के कारण वन्ध्यापुत्र के तुल्य
नाम मात्र ही उसका अंगीकार हे, अतः वह कहाँ हे २।१,२॥ हे श्रीरामचन्द्र, आप अज्ञानी मत
बनिये, आप ज्ञानवान् बनिये, भलीर्भौति विचार कीजिये, आकाश में दूसरा चन्द्रमा है ही नहीं,
पर भ्रान्ति से उसकी मिथ्या प्रतीति होती है