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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

नात्र तत्त्वादृते किंचिद्विद्यते वस्त्ववस्तु च । ऊर्मिमालिनि विस्तीर्णे वारिपूरादृते यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यहाँ पर तत्त्व के (अद्वितीय ब्रह्म के) सिवा न कोई भाव पदार्थ है और न अभाव हे । जैसे विशाल समुद्र मेँ जलराशि के सिवा अन्य कुछ नहीं हे वैसे ही संसार में ब्रह्म के सिवा अन्य भाव या अभाव पदार्थ नहीं हे