Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अन्तःशून्यापि सर्वत्र दृश्यते सारसुन्दरी ।
न क्वचित्संस्थितापीह सर्वत्रैवोपलक्ष्यते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि यह भीतर से पोली (निस्सार) है
तथापि सार से सुन्दर सी लगती है । यद्यपि वह कहीं पर भी स्थित नहीं हे, तथापि यहाँ
सभी स्थानों में दिखाई देती है