Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 42–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

पांसुमुष्टिरिवाकीर्य प्रेक्षिता पारमाणवी । आकाशनीलिमेवैषा निर्निमित्तैव दृश्यते ॥ ४२ ॥ द्विचन्द्रमोहवज्जाता स्वप्नवद्विहितभ्रमा । यथा नौयायिनः स्थाणुस्पन्दस्तद्वदिहोत्थिता ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बिखेर कर देखी गई परमाणुओं की धूलिमुष्टि कुछ भी प्रतीत नहीं होती, वैसे ही यह भी कुछ भी प्रतीत नहीं होती । आकाश की नीलिमा जैसे बिना किसी कारण के दृष्टिगोचर होती हे वैसे ही यह अकारण दिखाई देती है