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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 44–45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 44–45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

अनयोपहते चित्ते दीर्घकालमिवाकुलैः । जनैराकल्प्यते दीर्घसंसारस्वप्नविभ्रमः ॥ ४४ ॥ अनयोपहते स्वस्मिंश्चित्राश्चेतसि विभ्रमाः । उत्पद्यन्ते विनश्यन्ति तरङ्गास्तोयधेरिव ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

द्विचन्द्र के भ्रम के समान यह उत्पन्न हुई है, स्वप्न के समान विविध भ्रम उत्पन्न करती है, जैसे नौका से यात्रा करने वाले लोगों को स्थाणु (दूँठ) में स्पन्द की (गति) प्रतीति होती है, वैसे ही यह उदित हुई है ॥४ ३॥ जब यह चित्त को दूषित कर डालती है तब व्याकुल हुए लोगों को दीर्घकाल तक मिथ्या लम्बे संसार स्वप्न का भ्रम होता है