Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
करुणास्यन्दमानाक्षी स्रवन्क्षीरलवस्तनी ।
भवत्युल्लसितानन्दं जननी गृहिणी यथा ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अविद्या ही माता और पत्नी का रूप भी धारण करती है, ऐसा कहते हैं।
यह अविद्या कृपा से अश्रुपूर्ण नेत्रवाली तथा जिसके स्तनों से दूध की धारा बह रही हो,
ऐसी माता तथा गृहिणी के समान बड़े आनन्द के साथ होती है