Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
विषीकरोति निःस्यन्दसंतर्पितजगत्त्रयम् ।
सुधार्द्रार्द्रमपि क्षिप्रं प्रवृद्धं बिम्बमैन्दवम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
चाँदनी के रूप में
परिवर्तित अमृत बिन्दुओं से जिसने तीनों लोकों को तृप्त किया है, ऐसे अमृत से अत्यन्त
आर्द्र, पूर्ण चन्द्रमा के विम्ब को भी यह एक क्षण में विष बना देती है