Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
सुदीनाचारधर्मिण्या नित्यं प्राकृतकान्तया ।
अनारतास्तंगतया चित्रमन्धीकृतं जगत् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पामर की स्त्री अत्यन्त दीन-हीन आचार ओर धर्मवाली ओर नित्य
अन्धकार से (अज्ञान से) ढकी रहती हे वैसे ही इसका भी आचार ओर धर्म अत्यन्त दीन -हीन
है, यह पामर लोगों की प्रिय है ओर सदा असती है, इसने समग्र जगत् को अन्धा बना डाला हे,
यह बड़े खेद की बात हे