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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

अनन्तदुष्प्रसरविलासकारिणी क्षयोदयोन्मुखसुखदुःखभागिनी । इयं प्रभो विगलति केन वाऽसमा मनोगुहानिलयनिबद्धवासना ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्व वर्णित वासनामयी अविद्या का उपसंहार कर रहे श्रीरामचन्द्रजी अविद्या के उच्छेद का उपाय पूछते हैं। भगवन्‌, असंख्य दुश्चेष्टारूप विलास करनेवाली, मरण, जन्म आदि सुख-दुःख प्राप्त करानेवाली, विषम, तथा मनरूप गुहागृह में जिसने वासना बाँध रक्खी है ऐसी यह अविद्या किस उपाय से नष्ट होती है ?