Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
कर्ता संस्त्वमसक्तत्वाद्भावाभावे रघूद्वह ।
असक्तत्वादकर्तापि कर्तृवत्स्पन्दनं कुतः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रघुवर, अभिमान का अभाव होने पर कर्ता होते हुए भी आप उसमें
आसक्त न होने के कारण अकर्ता भी है, इसी प्रकार अकर्ता होते हुए भी उसमें भी अभिमान न
होने पर अकर्तृत्व में भी आसक्तिरहित होने से कर्ता भी हें ।
शंका: तो, क्या मैं अज्ञानी के सदश कर्ता हूँ ?
समाधान : नहीं, आप में अज्ञानी कर्ता के समान स्पन्दनरूप कर्तृत्व कैसे ? यानी अस्पन्द
आत्मा का साक्षात्कार कर चुके आप में अज्ञानी कर्ता के समान देह के स्पन्दन से
आत्मस्पन्दनभ्रमरूप कर्तृता की प्रसक्ति नहीं हे