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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 113, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 113, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 113 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

सत्यं स्याच्चेदुपादेयं मिथ्या स्याद्धेयमेव चेत् । उपादेयैकसक्तत्वाद्युक्ता सक्तिर्हि कर्मणि ॥ ९ ॥ यत्रेन्द्रजालमखिलं मायामयमवस्तुकम् । तत्र कास्था कथं नाम हेयोपादेयदृष्टयः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

क्रिया के फल के मिथ्या होने से कर्म में आसक्ति ही युक्त नहीं है, यों तर्क से भी दृढ़ करते हुए कहते हैं। यदि क्रिया का फल सत्य होता तो कर्तृता (क्रिया) उपादेय होती और यदि क्रिया का फल मिथ्या होता तो क्रिया हेय होती, क्योकि एकमात्र उपादेय में ही लोगों की आसक्ति होती है । क्रियाफल के मिथ्या होने पर क्रिया में आसक्ति उचित नहीं है । इन्द्रजाल के समान सभी मायामय ओर अवारतविक है, उनमें कौन आस्था है ओर कैसे हेय और उपादेय दृष्टियाँ हो सकती है २