Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
पौरुषोद्योगसिद्धेन भोगाशा रूपतां गता ।
असंकल्पनमात्रेण साविद्या प्रविलीयते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस अविद्या ने पुरुष के उद्योग से होने वाले संकल्प से विषयभोग की आशा का रूप धारण
किया है। निदिध्यासन की परिपुष्टतारूप पुरुषप्रयत्न से सिद्ध साक्षात्कार से बद्धमूल एकमात्र
असंकल्पन से यह अविद्या विलीन हो जाती है