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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 43–44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 43–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

नष्टोऽहमिति संकल्पाद्यथा दुःखेन नश्यति । प्रबुद्धोऽस्मीतिसंकल्पाज्जनो ह्येति यथा सुखम् ॥ ४३ ॥ तथा संमूढसंकल्पान्मूढतामेति वै मनः । प्रबोधोदारसंकल्पात्प्रबोधायानुधावति ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

“मे नष्ट हो गया” इस संकल्प से जैसे स्वप्न में दुःख से नष्ट होता है और “में जाग गया हूँ” इस संकल्प से स्वप्न दुःख के नाश को प्राप्त होता है, सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही विषय के संकल्प से मन मूढता को प्राप्त होता है । प्रबोधरूप उदार संकल्प से बोधमय ब्रह्मभाव की ओर अग्रसर होता हे