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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 45–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 45–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 45,46

संस्कृत श्लोक

क्षणात्संस्मरणादेषा ह्यविद्योदेति शाश्वती । यस्माद्विस्मरणादन्तः परिणश्यति नश्वरी ॥ ४५ ॥ भावनी सर्वभावानां सर्वभूतविमोहिनी । भारिणी स्वात्मनो नाशे स्वात्मवृद्धौ विनाशिनी ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं अज्ञानी हूँ ऐसे संकल्प से यह अनादि अविद्या एक क्षण में उदित होती है ओर विस्मरण के यानी संकल्पवासनाओं के मूलोच्छेद से नित्य नष्ट हुई यह नष्ट हो जाती हे । [2 दृष्टि फैलाने पर ऊपर आकाश में प्रगाढ़ कालिमा-सी प्रतीत होती है, पर आकाश में कोई रंग नहीं है, कारण कि आकाश नीरूप है । इसलिए पण्डित लोग अनुमान करते हैँ कि आकाश की जो नीलता है वह ओपाधिक है यानी वह आकाश से भिन्न किसी दूसरी वस्तु की प्रभा या प्रतिच्छाया है । इस विषय में योगियोँ की कल्पना यों है- सुमेरु से ऊपर के शिखर इन्द्रनील मणिमय हैं, उन्दीकी कान्ति छिटक कर ऊपर आकाश में जाकर नीलता दिखलाती हे । ज्योतिषी लोग कहते हैँ - अतिदूरता के कारण सूर्य की किरणं ब्रह्माण्ड खप्पर के समीप मेँ स्थित अन्धकार का विनाश नहीं कर सकती, इस कारण उस अन्धकार की प्रतिच्छाया को ही भूमि में स्थित लोग देखते हैं । अन्य विद्रान्‌ कहते हैं- यह नीलिमा ऊपर को छिटकी हुई पृथिवी की छाया द्वारा होती है । इन तीनों कल्पनाओं में कोई भी कल्पना श्रीरामचन्द्रजी को संगतरूप से प्रतीत नहीं हुई अतएव इस नीलता का वास्तविकरूप जानने की इच्छा करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी से वसिष्ठजी ने उसके उत्तर में कहा : जीवों की दृष्टिशक्ति के कुण्ठित होने पर अर्थात्‌ सामर्थ्यशून्य होने पर वस्तुदर्शन का अभावरूप अन्धकार स्फुरित होता है । वही वस्तुदर्शन के अभावरुप तम आकाश की कालिमारूप से अज्ञानियों को प्रतीत होता है । आत्मा के अदर्शन से अत्यन्त भारयुक्त यानी बढ़नेवाली सब पदार्थों को उत्पन्न करनेवाली और सम्पूर्ण प्राणियों को मोह में डालनेवाली यह अविद्या अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप की प्राप्ति होने पर नष्ट हो जाती हे