Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 47–48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 47,48

संस्कृत श्लोक

मनो यदनुसंधत्ते तत्सर्वेन्द्रियवृत्तयः । क्षणात्संपादयन्त्येता राजाज्ञामिव मन्त्रिणः ॥ ४७ ॥ तस्मान्मनोनुसंधानं भावेषु न करोति यः । अन्तश्चेतनयत्नेन स शान्तिमधिगच्छति ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

मन का निरोध करने पर भी इन्द्रियों से वासना का उद्भव क्यो नहीं होता, ऐसी यदि कोड शंका करे, तो उस पर कहते हैं। जैसे मन्त्री लोग राजा की आज्ञा को एक क्षण में पूरी कर देते हैं, वैसे ही मन जिस विषय का अनुसन्धान करता है सम्पूर्ण इन्द्रिय वृत्तियाँ उसको क्षणभर में कर डालती हैं। इसलिए जो पुरुष बाह्य पदार्थों में मन का अनुसन्धान नहीं करता, वह ब्रह्माहंभावनारूप यत्न से शान्ति को प्राप्त होता है