Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
परमार्थेन तत्त्वज्ञ ममाहमिदमित्यलम् ।
नदिश्रेण्योआत्मतत्त्वादृते सत्यं न कदाचन किंचन ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे तत्वज्ञ श्रीरामचन्द्रजी, परमार्थदर्शन से “मेरा, “मैं ये दोनों ही नहीं है । आत्मतत्त्व के सिवा
कोई भी वस्तु कभी भी सत्य नहीं हे