Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
खाद्रिद्यूर्वीनदिश्रेण्यो दृष्टिसृष्ट्या पुनः पुनः ।
सैवान्येव विचित्रेयमविद्या परिवर्तते ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश, पर्वत, द्युलोक, पृथिवी, नदियों की
श्रेणियाँ, ये सब दृष्टिसमकालिक सृष्टि से पुनः पुनः उत्पन्न होते हैँ । वही यह अविद्या अन्यके
समान विचित्र परिवर्तित होती है