Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 62–63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verses 62–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
यथा हि काष्ठजतुनोर्यथा बदरकुण्डयोः ।
श्लिष्टयोरपि नैकत्वं देहदेहवतोस्तथा ॥ ६२ ॥
भस्त्रादाहे यथा दाहो न भस्त्रान्तरवर्तिनः ।
पवनस्य तथा देहनाशे नात्मा न नश्यति ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे काष्ठ ओर लोह परस्पर मिले रहने पर भी
एक नहीं हैं और जैसे बेर और बर्तन परस्पर अत्यन्त संयुक्त होने पर भी अभिन्न नहीं हैँ वैसे
ही देह और आत्मा भी परस्पर संयुक्त होने पर भी अभिन्न नहीं हैं