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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

दुःखितोऽहं सुखाढ्योऽहमिति भ्रान्ति रघूद्वह । मृगतृष्णोपमां बुद्ध्वा त्यज सत्यं समाश्रय ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा देहरहित है, इसलिए उसके जन्म, मरण आदि की संभावना भी नहीं है, ऐसा कहते हैं । जैसे धौंकनी के जल जाने पर धौंकनीके अन्दर स्थित वायु का दाह नहीं होता, वैसे ही देह का नाश होने से आत्मा नष्ट नहीं होता ॥६ ३॥ हे राघव, मैं दुःखी हूँ, मैं सुखी हूँ, इस भ्रान्ति को मृगतृष्णा के तुल्य समझ कर छोड़ो ओर सत्यतत्त्व का अवलम्बन करो