Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
अहो नु चित्रं यत्सत्यं ब्रह्म तद्विस्मृतं नृणाम् ।
यदसत्यमविद्याख्यं तन्नूनं स्मृतिमागतम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह क्या
अचम्भे की बात नहीं है ? जो सत्य ब्रह्म है, उसे तो लोग भूल गये हैं और जो असत्य
अविद्यानामक वस्तु है उसका सबको अत्यन्त स्मरण हो गया है