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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 66

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 114, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 66

संस्कृत श्लोक

प्रसरं त्वमविद्याया मा प्रयच्छ रघूद्वह । अनयोपहिते चित्ते दुष्पारेह कदर्थना ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे रामचन्द्रजी, आप अविद्या को यानी आत्मविस्मरण को खूब बढ़ने का मौका न दीजिये। इस अविद्या द्वारा चित्त के दूषित होने पर यहाँ पर अनन्त अपार दुःख होते हैं