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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 115, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

यथेच्छं यजमानस्य मनसोपवनान्तरे । ययौ संवत्सरः साग्रो देवर्षिद्विजपूजया ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने उपवन के भीतर मन से अपनी इच्छा के अनुसार यज्ञ कर रहे राजा का देवता, ऋषि और ब्राह्मणों की पूजा से पूरा एक वर्ष बीत गया