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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 115, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

एवं स लवणो राजा राजसूयमवाप्तवान् । मनसैव हि तुष्टेन युक्तं तस्य फलेन च ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार राजा लवण ने सन्तुष्ट मन से ही राजसूययज्ञ किया, इसलिए उसी को यज्ञ का फल होना उचित है