Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 115, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 115, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 115 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
पूर्णे देशे सुसंपूर्णः पुमान्नष्टे विनश्यति ।
देहोऽहमिति येषां तु निश्चयस्तैरलं बुधाः ॥ ३५ ॥
उच्चैर्विवेकवति चेतसि संप्रबुद्धे दुःखान्यलं विगलितानि विविक्तबुद्धेः ।
भास्वत्करप्रकटिते ननु पद्मखण्डे संकोचजाड्यतिमिराणि चिरं क्षतानि ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार रामचन्द्रजी के प्रश्न का समाधान कर देवता आदि सदस्यो के प्रति विस्तार से
वर्णित अर्थ का निचोड कहते है ।
हे देवताओं, यह मनरूपी पुरुष काल आदि के परिच्छेद से रहित पूर्ण आलम्बन में
स्थित होकर पूर्णं होता है और नित्य नष्ट होने वाले काल आदि से परिच्छिन्न देह आदि
देश में स्थित होकर देहभाव की प्राप्ति से नष्ट हो जाता है । इसलिए “मेँ देह हूँ” ऐसी
जिनकी नश्वर देह में अहंभावना है, उनसे कोई प्रयोजन नहीं है । शारत्राभ्यास और
आचार्योपदेश से उत्पन्न सम्यक् विचार के परिपाक से सारासार विवेकवाले चित्त को “मेँ
देहादिस्वभाव कभी नहीं हूँ मैं पूर्णानन्दप्रकाश, एकरस ब्रह्म ही हूँ” ऐसा ज्ञान होने पर
ब्रह्मीभूत अधिकारी के सब दुःख समूल नष्ट हो जाते हैं, कभी भी उत्पन्न नहीं होते । सूर्य
की किरणों से प्रफुल्लित होने पर कमल के संकोच, जडता ओर अन्दर स्थित अन्धकार
आदि चिर काल के लिए नष्ट हो ही जाते हैं