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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवं मनःपरिक्षये सकलसुखदुःखानामन्तः प्राप्यत इति भवता प्रोक्तं तत्कथं महात्मंश्चपलवृत्तिरूपस्यास्य मनसोऽसत्ता भवति ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

गुरू की उक्ति का निचोड़ अर्थ अनुवादपूर्वक दिखलाते हुए श्रीयमवन्द्रजी अपनी बुद्धि के द्वारा तर्कित उपायोसे मन का विनाश होना सम्भव नहीं है, ऐसा समझते हुए मन के उच्छेद का दूसरा उपाय जानने के लिए गद्य से पूछते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे महात्मन्‌, इस प्रकार मन का विनाश होने पर सम्पूर्ण दुःखों का विनाश हो जायेगा, आपने कहा, पर यह चित्त तो अत्यन्त चपलवृत्ति है, इसका विनाश कैसे हो सकता है ?