Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
भावराशिस्तथा बोधः सर्वो यात्येकपिण्डताम् ।
विचित्रमृद्भाण्डगणो यथाऽपक्वो जले स्थितः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें मधुब्राह्मण श्रुति प्रमाण है :
इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्ये सर्वाणि थूतानि मधु (यह पृथिवी सम्पूर्ण
भूतो के लिए मधु है और इस पृथिवी के लिए सब भूत मधु हैं) इत्यादि ।
इसलिए समाधि के परिपाक से उत्पन्न होने वाले बोध से मन और मन के कार्यभूत प्रपंच
का और अविद्या का एकरस ब्रह्मात्मभाव शेष रहता है, ऐसा पद्य द्वारा उपसंहार करते हैं।
जैसे जल में रक्खे हुए कच्चे, रंग-बिरंग के मिट्टी के बर्तन एक पिण्ड बन जाते हैं वैसे ही
दृश्य पदार्थ समूह, उनको विषय करनेवाला विचित्र वृत्तिरूप बोध और उससे उपहित सब
जीव एक यानी ब्रह्मैकरस हो जाते हैं