Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
इह हि तावद्ब्रह्मणः सर्वभूतानां त्रिविधोत्पत्तिरिति तत्पूर्वोक्तम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि श्रीरामचन्द्रजी शंका करें, जिस मन का अनादि संसार में कभी नाश हुआ ही नहीं,
उसके विनाश की संभावना कैसे हो सकती है 2 इस पर उसके विनाश की संभावना के लिए
बीच-बीच में उसके नाश की प्रसिद्धि को ओर परिणामी स्वभाव होने से अन्य प्राणियों की
तुल्यता को दिखलाने के लिए पूर्वोक्त सात्विक आदि भेद से त्रिविध जीवसृष्टि का स्मरण
कराते हैं।
यहाँ पर ब्रह्म से सब भूतों की (५४६) त्रिविध (सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार
की) उत्पत्ति जो पहले कही है, उसका यहाँ पर स्मरण करना चाहिये