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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

तत्रेदंप्रथमया मनःकल्पनया देहीति सा ब्रह्मरूपिणी संकल्पमयी भूत्वा यदेव संकल्पयति तदेव पश्यति तेनेदं भुवनाडम्बरं कल्प्यते ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने संकल्प की विचित्रता से ब्रह्माण्डाकार में परिणित हिरण्यगर्भ के मन का विनाश प्रलयमें प्रसिद्ध है, क्योंकि उसके कार्य भौतिक पदार्थो का विलय देखा जाता है। इसलिए वह भी नश्वर है ऐसा अनुमान किया जा सकता है। इस प्रकार मूलकारण मन में विनाशस्वभावता का निश्चय होने पर उसके तुल्य स्वभाव होने के कारण हमारे मन में भी उक्त विनाशस्वभावता की संभावना की जा सकती है, इस आशय से कहते हैं। ५ यद्यपि बारह प्रकार की जीवजातियाँ पहले कही गई हैं तथापि बारहों जातियों का सात्विक, राजस और तामस भेदों में अन्तर्भाव होने से यहाँ तीन प्रकार की कही गई हैं अथवा आध्यात्मिक, आधिदैविक ओर आधिभौतिक भेद से यहाँ तीन प्रकार की जीवजातियाँ कही गई हैं । उन तीनों प्रकारों की सृष्टियों का मूल कारण हिरण्यगर्भं का मन ही है । हिरण्यगर्भ के मन के संकल्पानुसार और मन भी उनके कारण हैं, ऐसा पहले कहा जा चुका है । आद्य मन की कल्पना से चतुर्मुखाकार देहवाला में हूँ, इस प्रकार की जो ब्रह्मारूपिणी संकल्पमयी कल्पना है तद्रूप होकर वह जिसका संकल्प करती है, उसीको देखती है, क्योकि वह सत्यसंकल्प हे । उसीसे भुवनरूपी आडम्बर की कल्पना होती है