Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 116, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 116, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 116 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
ततः पुरःप्राप्तभूततन्मात्रपञ्चकतामेत्यान्तःकरणतां नीत्वा सात्वसूक्ष्मा प्रकृतिर्भूत्वा गगनपवनतेजोरूपतासंकल्पात्प्रालेयरूपतामुपेत्य शाल्योषधिं विशन्ती प्राणिनां गर्भतां च गच्छति ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर पहले प्राप्त रूप,
रस ओर गन्धरूप तन्मात्रा के क्रम से अपंचीभूत पंचतन्मात्रता को प्राप्त होकर मन, बुद्धि,
अहंकार, चित्तरूप व्यवहार हेतु जीवोपाधिता को प्राप्त हो पूर्वोक्त मन:शक्ति वृद्धि को प्राप्त
होकर प्रकृति होती है । पंचीकृत स्थूल प्रकृति होकर पंचीकृत आकाश, वायु, तेजोरूपता के
संकल्प से हिम, वृष्टि आदि जड़रूपता को प्राप्त होकर धान, गेहूँ आदि औषधियों में प्रवेश
करती हुई अन्न होती हे पुरुषों द्वारा उपभुक्त होकर वीर्यरूपता को प्राप्त होकर कलल,
बुदबुदादि के क्रमसे प्राणियों को गर्भदशा की प्राप्ति होती है