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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 15–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 117, verses 15–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 15-20

संस्कृत श्लोक

एषा ज्ञप्तेर्नवावस्था त्वं जाग्रत्संसृतिं श्रृणु । नवप्रसूतस्य परादयं चाहमिदं मम ॥ १५ ॥ इति यः प्रत्ययः स्वस्थस्तज्जाग्रत्प्रागभावनात् । अयं सोऽहमिदं तन्म इति जन्मान्तरोदितः ॥ १६ ॥ पीवरः प्रत्ययः प्रोक्तो महाजाग्रदिति स्फुरन् । अरूढमथ वा रूढं सर्वथा तन्मयात्मकम् ॥ १७ ॥ यज्जाग्रतो मनोराज्यं जाग्रत्स्वप्नः स उच्यते । द्विचन्द्रशुक्तिकारूप्यमृगतृष्णादिभेदतः ॥ १८ ॥ अभ्यासात्प्राप्य जाग्रत्त्वं स्वप्नोऽनेकविधो भवेत् । अल्पकालं मया दृष्टमेवं नो सत्यमित्यपि ॥ १९ ॥ निद्राकालानुभूतेऽर्थे निद्रान्ते प्रत्ययो हि यः । स स्वप्नः कथितस्तस्य महाजाग्रत्स्थितेर्हृदि ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

यह ज्ञान की नूतन अवस्था हे । अब आप जाग्रत संसार को सुनिये । नवप्रसूत बीजजाग्रत के बाद “अयं स्थूलदेहोऽहम्‌" (यह स्थूल देह मैं हूँ) “इदं देहभोग्यजातं मम" (यह देह-भोग्यसमूह मेरा है) ऐसी जो अपने में प्रतीति हे, उसे ही जाग्रत कहते हैं। यह अवस्था महाजाग्रत से विलक्षण हैं, क्योंकि इसमें पूर्व के अनुभव का अभाव है । "यह देह मेँ हूँ”, “यह भोग्य वस्तुजात मेरा है” इस जाग्रत प्रतीति के जन्म के अनन्तर उदय को प्राप्त हुआ अथवा पूर्वजन्म के सजातीय संस्कार के उद्बोधसे अच्छी तरह उदित हुआ, अतएव अभ्यास से दृढ, अर्थात्‌ जैसे ब्राह्मणादिजन्म में तुल्यता रहने पर भी जन्मान्तर के अभ्यास से किसी में ब्राह्मणोचित क्रियाओं में विशेष आग्रह तथा निपुणता देखी जाती है, सबमें ऐसी बात नहीं देखी जाती, अतः ऐहिक या जन्मान्तरीय दृढ़ाभ्यास से दृढता को प्राप्त हुआ जो पूर्वोक्त जाग्रतप्रत्यय है, उसीको महाजाग्रत कहते हैं । जाग्रत्स्वप्न का लक्षण कहते हैं। जाग्रत पुरुष का अनभ्यास से अदृढ अथवा दृढाभ्यास से दृढ़ जो तन्मयात्मक मनोराज्य है, उसी को जाग्रतूस्वप्न कहते हैं । जैसे राजा लवण को हुआ था। चन्द्रदशन, शुक्तिरूप्य आदि की भ्रान्तियाँ भी जाग्रत स्वप्न के ही भेद हैं, ऐसा कहते हैं। दो चन्द्रमाओं का दर्शन, सीप में चाँदी की प्रतीति, मृगतृष्णा आदि भेद से अभ्यासवश आग्रहभाव को प्राप्तकर स्वप्न अनेक प्रकार का होता है। स्वप्न का लक्षण कहते है। जिसे मैने अल्पकाल तक देखा, जो सत्य भी नहीं हैं, इस तरह की निद्रा के मध्य में अथवा निद्रा के अन्त में निद्राकाल में अनुभूत पदार्थो की जो प्रतीति है, उसे स्वप्न कहते हैं, वह स्वप्न अज्ञ पुरुष के महाजाग्रत में स्थित स्थूल शरीर के कण्ठ से लेकर हृदयपर्यन्त नाडी प्रदेश मेँ होता है