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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 10–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 117, verses 10–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 10-14

संस्कृत श्लोक

अहंतांशे क्षते शान्ते भेदे निःस्पन्दतां गते । अजडा या प्रकचति तत्स्वरूपमिति स्थितम् ॥ १० ॥ तत्रारोपितमज्ञानं तस्य भूमीरिमाः श्रृणु । बीजजाग्रत्तथा जाग्रन्महाजाग्रत्तथैव च ॥ ११ ॥ जाग्रत्स्वप्नस्तथा स्वप्नः स्वप्नजाग्रत्सुषुप्तकम् । इति सप्तविधो मोहः पुनरेव परस्परम् ॥ १२ ॥ श्लिष्टो भवत्यनेकाख्यः श्रृणु लक्षणमस्य च । प्रथमे चेतनं यत्स्यादनाख्यं निर्मलं चितः ॥ १३ ॥ भविष्यच्चित्तजीवादिनामशब्दार्थभाजनम् । बीजरूपं स्थितं जाग्रद्बीजजाग्रत्तदुच्यते ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्दर अहन्तांश के और बाहर भेद के विनष्ट ओर शान्त होने पर तथा दोनों जगह निस्पन्द होने पर स्वप्रकाश चित्‌ का जो विकास है, वही स्वरूप है यह सिद्धान्त है । उस प्रत्यक्‌ चैतन्य में अज्ञान का अनादि रूप से अध्यास किया गया है । इस समय उस अज्ञान की इन भूमिकाओं को आप सुनिये- बीजजाग्रत, जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत्स्वप्न, स्वप्न, स्वप्नजाग्रत ओर सुषुप्ति इस प्रकार सात तरह का मोह है । यह सात प्रकार का मोह परस्पर संश्लिष्ट होकर बहुत से नामों को धारण करता है । सात प्रकार के मोहों में से प्रत्येक का लक्षण आप सुनिये | सृष्टि के आदि में अथवा जागरण के आदि में मायाशबल चेतन्यसे प्राणधारण आदि क्रियारूप उपाधि से भविष्य में होनेवाले चित्त, जीव आदि नामशब्दों ओर उनके अर्थो का भाजनरूप तथा वक्ष्यमाण जाग्रत का बीजभूत जो प्रथम चेतन (चिदाभाससंवलित स्वरूप) है, वह बीजजाग्रत कहलाता है