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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verses 8–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 117, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये हि या स्थितिः । निरस्तमनना यासौ स्वरूपस्थितिरुच्यते ॥ ८ ॥ संशान्तसर्वसंकल्पा या शिलान्तरिव स्थितिः । जाड्यनिद्राविनिर्मुक्ता सा स्वरूपस्थितिः स्मृता ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में जाने पर यानी पूर्व विषय से हटकर अन्य विषय में जाने के पहले बीच में जो मननरहित स्थिति है वह स्वरूपस्थिति कही जाती है । सब प्रकार की कल्पनाओं से शून्य, जडता और निद्रा- इन दो अवस्थाओं से निर्मुक्त तथा शिला के मध्य के तुल्य (जैसे पत्थर का मध्य निश्चल होता है उसके सदश) जो स्थिति है, वह स्वरूप की स्थिति कही गई हे