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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 117, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 117, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 117 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

स्वरूपावस्थितिर्मुक्तिस्तद्भ्रंशोऽहंत्ववेदनम् । एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं तज्ज्ञत्वाज्ञत्वलक्षणम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले दोनों भूमिकाओं में से प्रत्येक का फलतः साधारण लक्षण कहते हैं। स्वरूप में स्थिति मुक्ति है एवं अहन्ता की प्रतीति उसकी च्युति है (अहं' यह बोध होने पर ही स्वरूपावस्थितिरूप मुक्ति च्युत हो जाती है इस कारण बद्ध अवस्था प्राप्त होती है) क्योंकि “अहम्‌* का उदय होने पर स्वरूपस्थितिरूप मुक्ति की विस्मृति होती हे । संक्षेपतः यही तत्त्वज्ञ ओर अतत्त्वज्ञ का लक्षण है