Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 118, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 118, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 118 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
भूमिकात्रितयाभ्यासाच्चित्तेऽर्थे विरतेर्वशात् ।
सत्यात्मनि स्थितिः शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृता ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
योगशास्त्र में भी कहा गया है :
श्रोत्रादिकरणैयाविच्छब्दादिविषयग्रह: । तावद्धयानमितिप्रोक्तं समाधिः स्यात्ततः परः ॥
अर्थात् जब तक श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है तब तक
ध्यान कहलाता है, तदनन्तर यानी श्रोत्र आदि इन्द्रियों से शब्द आदि विषयों का ग्रहण न होने
पर समाधि होती है।
शुभेच्छा, विचारणा ओर तनुमानसा - इन तीन भूमिकाओं के अभ्यास से बाह्य विषयोंमें
संस्कार न रहने के कारण चित्त में अत्यन्त विरक्ति होने से माया, माया के कार्य ओर तीन
रम् गुरूसेवा, भिक्षान्नभोजन, शौच आदि यतिधर्मपालनसहित श्रवण मनन ही यहाँ पर सदाचार
है, अन्य सदाचार चित्तशुद्धिमात्र का हेतु है अतः वह पहले ही सिद्ध है ।
अवस्थाओं से शोधित, सबके आधार, सन्मात्ररूप आत्मा में क्षीर में जलके तुल्य ज्ञान, ज्ञाता,
ज्ञेयभाव के विनाश से साक्षात्कारपर्यन्त जो स्थिति यानी निर्विकल्प समाधिरूपा स्थिति है,
वह सत्त्वापत्ति है, क्योंकि उसमें मन परमात्मसत्त्व रूप से स्थित हो जाता है। इस भूमिका में
जीव ब्रह्मवित् कहा जाता है